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Tuesday, July 7, 2026

*ईश्वर का धन्यवाद*

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बहुत पुरानी बात है, एक नगर में दो व्यक्ति एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे। एक व्यक्ति सम्पन्न था और दूसरा बहुत गरीब। 

एक दिन नारद जी ने दोनों को देखा और वे विष्णु भगवान के पास गये। उन्होंने  आश्चर्य प्रकट करते हुये विष्णु भगवान से यह समझाने का आग्रह कि दोनों पड़ोसी हैं किंतु एक इतना अमीर और दूसरा इतना गरीब। ऐसा क्यों है। 

नारदजी ने भगवान से पूछा, भगवान यह कैसा न्याय है, एक व्यक्ति इतना संपन्न और दूसरा इतना गाना।

विष्णु भगवान ने कहा - नारद जी, इस स्थिति के लिये वे दोनों खुद ज़िम्मेदार हैं। नारद जी ने कहा - भगवान, हम कुछ समझे नहीं, कृपया इसे विस्तारपूर्वक समझाईये। 

विष्णु भगवान ने नारदजी से कहा -  आईये, दोनों के पास चल कर ही, हम आपके प्रश्न का उत्तर ढूँढते हैं।

नारद जी और विष्णु भगवान भेष बदल कर, पहले ग़रीब व्यक्ति के घर पहुँचे। 

गरीब व्यक्ति अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में पुरानी खटिया पर बैठा होता है। भगवान विष्णु, व्यक्ति से पूछते हैं कि क्या तुम भगवान से कुछ चाहते हो। वह व्यक्ति कहता है कि मैं हमेशा अपने पड़ोसी की तरह संपन्न बनना चाहता हूँ। क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं? भेष बदले विष्णु भगवान कहते हैं - बिल्कुल मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ, मेरे पास एक मंत्र है, अगर तुम उस मंत्र को अपना लो तो तुम भी अपने पड़ोसी की तरह संपन्न हो सकते हो। 

भगवान की यह बात सुनकर वह व्यक्ति उत्तर देता है - जी हाँ, आप मुझे मंत्र बतायें, मैं मंत्र अपनाने को तैयार हूँ।

विष्णु भगवान कहते हैं ठीक है, तो सुनो, तुम्हें ईश्वर को धन्यवाद देना होगा। 

यह सुनकर, व्यक्ति कहता है मैं ईश्वर को किस बात का धन्यवाद दूँ। ईश्वर ने  मुझे कुछ नहीं दिया। विष्णु भगवान एक बार फिर उस व्यक्ति से पूछते हैं तो वह व्यक्ति फिर ईश्वर को धन्यवाद देने को मना करता है। 

जैसे ही वह व्यक्ति ईश्वर को धन्यवाद देने को मना करता है, भगवान उससे कहते हैं कि यदि तुम मंत्र को नहीं मानोगे तो तुम्हारा कुछ नहीं हो  सकता है। यह कहते हुये भगवान और नारद जी अंतर्ध्यान हो जाते हैं। तभी इस व्यक्ति की एक मात्र खटिया भी टूट जाती है और ज़मीन में गढ्ढा हो जाता है जहाँ वह गिर जाता है।

विष्णु भगवान और नारद जी अब सम्पन्न व्यक्ति के घर पहुँचते हैं और दरवाज़ा खटखटाते हैं।अमीर आदमी मुस्कुराते हुये दरवाज़ा खोल कर वेष बदले हुये भगवान विष्णु और नारद जी का स्वागत करता है और निश्छल हृदय से बड़ी आवभगत करता है।

भगवान उस व्यक्ति से कहते हैं कि हम दोनों तुम्हारे अतिथि सत्कार से बहुत प्रसन्न हुये हैं। बताओ हम तुम्हारे लिये क्या कर सकते हैं ? 

यह सुनते ही वह व्यक्ति कहता है कि भगवान का दिया मेरे पास सब कुछ है किंतु .....। भगवान उससे पूछते हैं किंतु क्या, तुम निःसंकोच हम से कहो। 

व्यक्ति ने कहा - भगवान ने हमको इतना अधिक धन दिया है कि इसे समेटते नहीं बनता। मैं चाहता हूँ कि भगवान मुझे और धन नहीं दें मुझे अब और धन नहीं चाहिये। 

यह सुनकर भगवान ने इस व्यक्ति से कहा- यदि तुम ऐसा चाहते हो तो मैं तुमको एक मंत्र बता सकता हूँ, तुम्हें इस मंत्र को अपनाना होगा। अगर तुमने यह मंत्र अपना लिया तो जो तुम चाहोगे, वैसा ही होगा। 

वह व्यक्ति भगवान से कहता है कि वे उसे मंत्र ज़रूर बतायें। भगवान इस व्यक्ति से कहते हैं कि तुमको बात-बात में ईश्वर को धन्यवाद देना  छोड़ना होगा। 

यह सुनकर वह व्यक्ति कहता है मेरे पास जो कुछ भी है वह सब ईश्वर का दिया हुआ है, मैं किस प्रकार ईश्वर को धन्यवाद देना छोड़ दूँ।आपका मंत्र तो मैं नहीं मान सकता हूँ।

यह सुनकर भगवान ने उस व्यक्ति से कहा कि अगर तुम मंत्र नहीं मानोगे तो तुम्हारी संपन्नता इसी तरह बढ़ती ही जायेगी, यह कभी नहीं रुकेगी तुम्हारा भी कुछ नहीं हो सकता।

नारद जीअब देख रहे थे।उन्हें अपने प्रश्न उत्तर मिल गया । विष्णु भगवान और नारद जी एक दूसरे को देख कर मुस्कुराये और अपने धाम लौट गये।

*सादर*

*प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेंद्र सदा* 

🙏🏻😇😇🌈🌈🙏🏻

Thursday, July 2, 2026

सत्संग का सुख 🌈🌈

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हनुमान भगवान जी जब मच्छड़ का रूप ले कर रात में लंका प्रवेश कर रहे थे तब लंका की पहरेदार लंकिनी ने उन्हें रोका। 

हनुमान भगवान जी ने लंकिनी पर घूँसे से प्रहार किया जिससे लंकिनी ज़मीन पर गिर पड़ी।

लंकिनी को याद आया कि ब्रम्हाजी ने लंका की पहरेदारी सौंपते हुये उससे कहा था कि जब एक बंदर के रूप में भगवान राम के दूत आ कर तुम पर प्रहार करेंगे तब समझ लेना कि अब राक्षसों के संहार का समय आ गया है। 

लंकिनी ने ज़मीन से उठकर भगवान राम  और भगवान हनुमान जी को श्रद्धापूर्वक नमन किया और कहा कि आप के दर्शन का सुअवसर हमें मिला, हम धन्य हो गये। 

आपने आगे कहा कि यदि तराज़ू के एक पलड़े में स्वर्ग और मोक्ष का सुख रख दिया जाये और दूसरे में सत्संग का सुख तो सत्संग का पलड़ा हमेशा भारी होगा।

*सादर*

*जय सियाराम सदा*

🙏🏻😇😇🌈🌈🙏🏻

Saturday, May 30, 2026

स्वयं की प्रशंसा कभी नहीं 🌈🌈

 🌼🌸☘️🌼🌸🍀

बात आज से लगभग 5000 साल पहले की है। पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र में महाभारत का भीषण युद्ध चल रहा था। रोज हजारों हज़ार योद्धा वीरगति को प्राप्त हो रहे थे। किन्तु युद्ध का निर्णय नहीं हो पा रहा था जिसका एक बड़ा का कर्ण थे, और युधिष्ठिर इस परिस्थिति को भाँप रहे थे। ऐसी विकट परिस्थिति में बेहद संयमी युधिष्ठिर का संयम भी डिग गया।

उन्होंने असंयमित होकर अर्जुन से कहा -अर्जुन तुम कैसे धनुर्धर हो और कैसा तुम्हारा गांडीव है जो कर्ण को नहीं जीत पा रहा है।

अर्जुन अपने धनुष के तिरस्कार और अपमान को सुनकर धर्मसंकट में पड़ गये। अर्जुन ने यह संकल्प लिया था तो गांडीव का अपमान करने वाले व्यक्ति को वे जीवित नहीं छोड़ेंगे, पर वे अपने बड़े भाई को तो नहीं मार सकते हैं तो फिर क्या उनका संकल्प टूटेगा ?

अर्जुन के मन के इस ऊहापोह को पढ़ कर भगवान कृष्ण कहते हैं - अर्जुन तुम्हारी समस्या का समाधान शास्त्रों में है, यदि तुम अपने भाई का अपमान कर दो तो वह उनकी हत्या के बराबर ही है। 

न चाहते, हुये भी अर्जुन राज दरबार में जा कर युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह निरर्थक युद्ध सिर्फ इस कारण लड़ा जा रहा है क्योंकि आपने जुआ खेला और आप सब कुछ हार गये। छोटे भाई के हाथों इस प्रकार का  अपमान देखकर युधिष्ठिर अवाक रह जाते हैं। 

इस घटना के बाद अर्जुन बेहद दुखी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने बड़े भाई का अपमान किया। वे अब आत्महत्या करना चाहते थे। भगवान कृष्ण ने उन्हें फिर समझाया कि इस समस्या का समाधान भी शास्त्रों में है। अर्जुन ने भगवान से पूछा कि मेरी इस भावना से छुटकारा का क्या उपाय है ? 

भगवान ने अर्जुन से कहा कि तुम स्वयं की प्रशंसा करो। शास्त्र कहते हैं कि स्वयं की प्रशंसा आत्महत्या के बराबर ही है।

🙏🏻🌈🌈😇😇🙏🏻

गृध्रराज पर्वत का महात्म्य 🌈🌈

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कल 14 दिसंबर को गिधैला, देवराजनगर, मैहर में, गृध्रराज पर्वत के सम्मुख, एक पहाड़ पर निर्माणाधीन राजाधिराज बड़े मंदिर के परिसर जिसे छोटी अयोध्या भी कहा जाता है, जहाँ पंचमुखी बजरंगबली भगवान विराजे हैं, में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा खाद्य प्रसंस्करण से रोज़गार विषय पर इस रमणीक स्थल पर आयोजित प्रशिक्षण में भाग लेने का मौका मिला।

यह पर्वत, विंध्याचल की कैमूर श्रृंखला (Kaimur Range) और मैकाल पहाड़ियों (Maikal Hills) के बीच में पड़ता है।

​यह पर्वत स्वयं उत्तर में कैमूर श्रृंखला की पहाड़ियों और दक्षिण में मैकाल पहाड़ियों के बीच स्थित है, लेकिन इसे समग्र रूप से विंध्याचल पर्वतमाला का पूर्वी विस्तार माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस पर्वत का आकार जटायु महाराज की आकृति की तरह है।

यह भी कहा जाता है कि इस पर्वत की तलहटी में जटायु जी के अनुज संपाति का जन्म हुआ था तथा जटायु महाराज और संपाति जी यहीं रहा करते थे।

पुराणों में उल्लेख है कि संपाती और जटायु विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे और दंडकारण्य क्षेत्र में विचरण करते थे।

ऐसा कहा जाता है कि रावण से युद्ध में आहत हो कर जटायु महाराज इसी पर्वत पर आये थे।

ऐसा माना जाता है कि इस पर्वत पर भगवान राम ने एक रात विश्राम किया है तथा भरत जी का आश्रम भी यहीं स्थित था।
इस पर्वत पर कई ऋषि मुनियों ने तपस्या की है और अभी भी करते हैं।

इस पर्वत के दूसरी ओर सिद्ध बाबा का आश्रम है जिसके पास से एक ठंडी जल धारा का उद्गम है जो आगे जा कर गर्म हो जाती है। कुछ दूर और जाने पर यह विलुप्त हो जाती हैं। इन्हें मानसी गंगा कहा जाता है।
इन्हें पवित्र मानकर और महाकवि कालिदास की एक रचना (गृद्धराज महात्म्य) के आधार पर 'मानसी गंगा' नाम दिया गया है। यह मान्यता है कि इस जलस्रोत में स्नान करने से शुद्धि प्राप्त होती है।

इस पर्वत से कुछ दूर पर स्थित एक और पहाड़ पर माँ काली का मंदिर है जो कि मैहर में विराजी माँ शारदा की बहन मानी जाती हैं।

माता जी की मूर्ति, ज़मीन की खुदाई में मिली हैं जिसकी जानकारी स्थानीय शासक को स्वप्न में मिली।
*सादर*
🙏🏻😇😇🌈🌈🙏🏻

Saturday, July 12, 2025

अम्मा की सीख ...

🌻🌼🍀🌻🌼☘️

अम्मा कहती थीं हमेशा अच्छा-अच्छा बोलो क्योंकि 24 घण्टे में माँ सरस्वती ज़ुबान पर आती हैं। पर माँ कब ज़ुबान पर आयेंगी यह हमें मालूम नहीं होता। माँ जब भी ज़ुबान पर आयेंगी तो बोली हुई बात सच हो जायेगी। इसलिये हमेशा अच्छा-अच्छा बोलो अच्छा-अच्छा सोचो।


आकर्षण का नियम (Law of Attraction) भी यही कहता है जिसे एमवे कम्पनी की ट्रेनिंग में  बहुत अच्छी बात के रूप में सिखाया जाता था।कहा जाता था कि यदि आपके पास टू-व्हीलर है तो आपके पास टूव्हीलर चलाने वाले लोग ही आयेंगे किन्तु यदि आपके पास फोर व्हीलर है तो आपसे फोर व्हीलर वाले लोग मिलने आयेंगे।


इस बात का अर्थ यह है कि जैसे हम हैं, जिस सोच, समझ, मनःस्थिति और मनोदशा, आर्थिक स्थिति और परिस्थिति में हैं, यदि उन्हें बदल दें तो हम अपनी दुनिया बदल सकते हैं।


सबसे पहले, जो कुछ भी हमारे पास है और हम जिस भी परिस्थिति में हैं उसे खुशी-खुशी स्वीकार करें, उससे भागे नहीं।


फिर, जो भी हमारे पास है, जिसको अंग्रेज़ी में Haves (हैव्ज़) कहते हैं, उसके बारे में सोचा करें, ऐसा सोचने से और जो कुछ भी ईश्वर ने हमें दिया है उसके लिये ईश्वर को धन्यवाद देने से बरकत होती है।


जो हमारे पास नहीं है जिसे अंग्रेज़ी में Have Nots (हैव नॉट्स) कहते हैं, उसके बारे में सोचने की आवश्यकता नहीं है, इससे हमारा मन और समय खराब होता है साथ ही आत्मबल भी कमज़ोर हो जाता है।


प्रियतम बाबा कहते हैं कि चिंता हमारी पूरी ऊर्जा को खत्म कर देती है और हमारे अंदर नकारात्मक संस्कार को जन्म देती है। प्रियतम बाबा आगे आश्वस्त करते हुये कहते हैं अपनी क्षमता के अनुसार उत्तम कर्म करो, चिंता मत करो, मैं तुम्हारी सहायता करूंगा (Do Your Best then Don't Worry Be Happy 😊😊💐💐, I will Help You)


ऐसा लगता है कि प्रियतम बाबा ने यह कह कर हमें विकल्प नहीं दिया है बल्कि यह उनका आदेश है, जिसका पालन करना ही है।

*सादर*
*प्रियतम अवतार मेहेरबाबा जय जिनेन्द्र सदा*
🙏🏻😇😇🌈🌈🙏🏻

आपसे विनम्र आग्रह है कि कृपया लेख के बारे में अपने अमूल्य विचार और सुझाव कमेंट बॉक्स में अंकित कर प्रोत्साहित करने का कष्ट करें,

सादर 

जय प्रियतम अवतार मेहर बाबा जय जिनेंद्र सदा

🙏🏻😇😇🌈🌈🙏🏻

Friday, July 11, 2025

शिक्षा, शिक्षक और विद्यार्थियों के लिये ईश्वरीय वरदान ए.आई. (आर्टिफिशियल इंटेलिजैन्स)

🌻🌼🍀🌻🌼☘️

महाविद्यालयों की कक्षाओं में, विद्यार्थियों की कम होती उपस्थिति एक विचारणीय विषय बनता जा रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि ऑन लाईन संसाधन, जैसे गूगल, यू-ट्यूब और अब ए. आई. (आर्टिफिशियल इंटैलिजैन्स) मंच, छात्रों को, पाठ्यक्रम के अध्ययन के लिये पर्याप्त लगते हैं । बचे हुये समय को वे नौकरी के लिये प्रतियोगी परीक्षाओं और साक्षात्कार की तैयारी में लगाना अधिक उपयोगी समझते हैं ।


कुछ ऐसा करें कि छात्र खुशी-खुशी।कक्षा में आयें:
नियमानुसार, कक्षा में पचहत्तर प्रतिशत उपस्थिति की अनिवार्यता के बल पर छात्रों को कक्षाओं तक लाया तो जा सकता है किंतु, शायद, स्थिति वही बेहतर हो कि वे स्वप्रेरित हो कर कक्षाओं में खुशी-खुशी आयें।

कक्षा का वातावरण और शिक्षा:
छात्रों को कक्षा में बुलाने के लिये कक्षा के वातावरण और शिक्षा प्रदान करने की पद्धति दोनों में सुधार और संयोजन करने की आवश्यकता है, जिसके लिये, आधुनिक संचार क्रांति के संसाधनों के इस दौर में, कक्षा, शिक्षा और शिक्षक की भूमिका तथा इनके परस्पर संयोजन को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है।

ज्ञान और सूचना में अंतर होता है:
विषय को, सूचना नहीं बल्कि ज्ञान के रूप में जानना, समझना, आत्मसात करना और उपयोग कर पाना ही शिक्षा है । शिक्षा की एक बहुत ही सुंदर परिभाषा इलाहाबाद कृषि संस्थान के प्रशासनिक भवन के बाहरी दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में अंकित है । यह परिभाषा कहती है कि ‘शिक्षा मनुष्य की प्रवृत्ति को मुक्त करने की लिये है’ । मनुष्य की प्रवृत्ति मूल रूप से पाश्विक है किन्तु ज्ञान के माध्यम से,  विवेक जागृत कर, वह इस प्रवृत्ति से मुक्त हो सकता है।

ऑन लाईन मंच, विषय के बारे में जानकारी और सूचनायें तो देती हैं किंतु यह ज्ञान प्रदान नहीं कर पातीं क्योंकि यह मंच अनुभव साझा नहीं करते। सूचना और जानकारी जब अनुभव के साथ सम्मिश्रित होता है तब यह ज्ञान का स्वरूप प्राप्त करता है ।

ज्ञान हस्तांतरित करने के पूर्व, उपस्थित छात्रों की, विषय संबंधी सामूहिक समझ के स्तर को समझना और इस स्तर के अनुसार शिक्षित करना बेहतर होगा । शिक्षक और छात्र के मध्य स्थापित भावनात्मक सेतु भी छात्रों द्वारा ज्ञान को ग्रहण करना सुगम्य बनाता है । इसी तरह ज्ञान का सम्प्रेषण और प्रभावी हो जाता है यदि शिक्षक का व्यक्तित्व आकर्षक और प्रेरक हो साथ ही शिक्षक ज्ञानी हो । 

शिक्षक को ऑंलाईन मंच से एक कदम आगे रहना पड़ेगा, उन्हें नवीनतम शोध का अध्ययन करना होगा, नवाचारी और रचनात्मक होना होगा ।

कक्षा से कार्यशाला की ओर:
वर्तमान परिदृश्य में कक्षा  को कार्यशाला में परिवर्तित करना होगा जहाँ शिक्षा देना ही मात्र उद्देश्य नहीं होगा बल्कि शिक्षा के साथ कौशल संवर्धन भी आवश्यक हो जिससे कार्यशाला का रूप धारण की हुई कक्षा छात्रों के लिये अधिक रोचक होगी और वे कक्षा में उपस्थित होने के लिये तत्पर होंगे जहाँ वे ज्ञान विज्ञान को अपने अनुभव के साथ सीखेंगे। पाठ्यक्रम में प्रायोगिक कक्षाओं पर अधिक बल देना भी छात्र-छात्राओं को एक ओर अधिक सीखने का मौका देगा वहीं इन्हें कक्षा में उपस्थित होने का कारण भी देगा ।

कक्षा को रोचक बनायें:
ष्टि आई.ए.एस. के फाऊंडर और शिक्षक कहते हैं कि छात्रों को लंबे समय तक कक्षा में बाँध कर रखना आसान नहीं होता है । शिक्षक को अपनी गरिमा रखते हुये, छात्रों के स्तर पर आ कर विभिन्न रोचक कथाओं, प्रसंगों और चुटकुलों के माध्यम से भी कक्षा का वातावरण मज़ेदार बना कर रखना पड़ता है । तो शिक्षकों को स्वयं और कक्षा के वातावरण को बदलना सीखना होगा उसे शिक्षा प्रदान करने के नये उपकरणों का उपयोग सीखना होगा और सबसे बड़ी बात उसे इस प्रक्रिया में आनंद ढूँढना होगा।

चलते हैं स्मरण से कौशल संवर्धन की ओर:
कहते हैं कि परिवर्तन को छोड़ सब परिवर्तनीय है अर्थात परिवर्तन स्थायी है। तेज़ी से बदलते शैक्षणिक जगत के बारे में प्रख्यात शिक्षाविद प्रो.एस. व्ही.आर्य कहते हैं कि रोज़ कुछ न कुछ पढ़ते रहें सीखते रहें ताकि आप प्रासंगिक रहें। बदलते ज्ञान और शिक्षा जगत में रत शिक्षक और छात्रों को इस बात का ध्यान रखना होगा कि अब स्मरण का कार्य करने के लिये कम्प्यूटर है किंतु उन्हें इस ज्ञान का उपयोग करना अच्छी तरह सीखना होगा अर्थात अब ज्ञानार्जन, स्मरण  के बजाय कौशल संवर्धन की ओर हो गया है । 

कार्य कुशलता और कार्य दक्षता का महत्व:
ध्यान दें कि एक नौकरी ढूँढ रहे उम्मीदवार की कीमत उसकी कार्यदक्षता अथवा कार्य कुशलता ही है न कि उसे प्राप्त उपाधियाँ अथवा डिग्रियाँ। हाँलाकि कार्य कुशलता अथवा कार्य दक्षता प्राप्त करने की पहली सीढ़ी विषय सम्बन्धी ज्ञान ही होता है। पूर्व में मल्टीटास्किंग (कई कार्यों को एक साथ करने की क्षमता) करने वाले एम्प्लॉई (कर्मचारी) को पसंद किया जाता था किंतु आज फिर विषय विषेज्ञता को ही पसंद किया जा रहा है जिसके लिये ज्ञान, कुशलता / दक्षता का संगम आवश्यक है।

ज्ञानेन्द्रियाँ और सीखने की प्रक्रिया:
कहते हैं कि, पाँच ज्ञानेंद्रियों, दृष्टि (चक्षु अथवा आँख), कर्ण (सुनना), स्पर्श (त्वचा, छूना), रसना (जिव्हा), नासिका (नाक, सूंघना) में से जितनी अधिक से अधिक इंद्रियों का उपयोग सीखने में किया जाये उतना ही पक्के रूप से किसी भी ज्ञान को सीखा जा सकता है। इसी बात के लिये एक प्रसिद्ध कहावत है कि अगर हम सिर्फ सुनेंगे तो भूल जायेंगे, अगर हम सुनेंगे और देखेंगे तो याद रखेंगे, अगर हम सुनेंगे, देखेंगे और कर के देखेंगे (अनुभव प्राप्त करना)
तो सीखेंगे (If I hear, I will forget, If I see I will remember, If I do I will learn.)
ऑनलाईन मंच इन बिन्दुओं में गौण रह जाता है। यह मंच तो बस विषय को छात्रों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं और विषय को समझना और आत्मसात करने की पूरी ज़िम्मेदारी छात्र की स्वयं होती है । छात्र-छात्राओं को यह समझना होगा कि याद रखने में और सीखने में अंतर होता है। इस लेख में पूर्व में हमने देखा कि आपकी नियोक्ताओं के बीच आपकी माँग तो तभी बढ़ेगा जब आप अपनी कार्य कुशलता और दक्षता को बढायेंगे और इसे बढ़ाने के लिये आपको कक्षा में आना ही पड़ेगा।

ऑन लाईन मंच शिक्षा हेतु वरदान:
आवश्यक यह है कि ऑन लाईन मंच को चुनौती नहीं मानें बल्कि यह शिक्षक और विद्यार्थी के लिये ईश्वर का वरदान हैं । शिक्षा उपकरणों के उपयोग और ऑन लाइन मंचों के माध्यम से शिक्षा के आदान प्रदान को और भी अधिक प्रभावशाली बनाया जा सकता है । इस तरह मिलेजुले प्रयासों से छात्रों को कक्षा की ओर फिर से उन्मुख किया जा सकता है क्योंकि यह मंच क़िताबों की तरह ही हैं, ऑन लाईन लाईब्रेरी हैं, शिक्षा तथा शिक्षण कार्य के लिये पूरक है ।

ईश्वर प्रदत्त बुद्धिमत्ता श्रेष्ठ:
 लिखने की विधा नहीं थी तब, जब शिलाओं पर, पत्तों और कागज़ पर लिखा जाने लगा तब भी गुरु और शिक्षक उपयोगी थे और आज जब ऑन लाईन विषय का सृजन होने लगा तब भी शिक्षक और कक्षा की उपयोगिता और महत्व में कोई कमी नहीं आई है न कभी  आयेगी । आखिर ए. आई. कृत्रिम बुद्धिमत्ता ही है ईश्वर प्रदत्त बुद्धिमत्ता नहीं है। ए.आई.वहीं तक सीमित है जितना मनुष्य ने उसे सीखा दिया किन्तु मनुष्य की रचना तो असीमित ईश्वर ने की है। प्रियतम अवतार मेहेरबाबा कहते हैं कि बुद्धिमत्ता से कहीं आगे है अंतर्ज्ञान (इन्ट्यूशन), प्रेरणा (इंस्पिरेशन) और प्रेम (लव)। प्रियतम बाबा आगे बताते हैं कि हमारी गैलेक्सी, 'मिल्की-वे' में 18000 (अट्ठारह हज़ार) धरतियाँ ऐसी हैं जहाँ जीवन है। अन्य धरतियों के लोग बुद्धि में हमारी धरती के लोगों की तुलना में बहुत आगे हैं किंतु उनमें भावना की बहुत कमी है। भावना और बुद्धि का पूर्ण सन्तुलन सिर्फ हमारी धरती के मनुष्यों में ही है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (ए. आई.) जितनी भी बढ़ जाये किन्तु शिक्षक और छात्र के बीच के भावनात्मक रिश्ते, छात्रों को कक्षा में अवश्य ले आयेंगे।

सादर
प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेन्द्र सदा

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सादर 

जय प्रियतम अवतार मेहर बाबा जय जिनेंद्र सदा

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Sunday, June 1, 2025

ईश्वर साक्षात्कार की कुंजी

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प्रियतम अवतार मेहेरबाबा कहते हैं कि संस्कारों के कारण ही जीव पुनर्जन्म के चक्र में रहता है। यह संस्कार बेड़ियाँ हैं। बुरे संस्कार लोहे की बेड़ियाँ हैं तो अच्छे संस्कार सोने की बेड़ियाँ। ईश्वर से एकाकार करने के लिये दोनों ही प्रकार के संस्कारों से छुटकारा पाना आवश्यक है, जिसकी कुंजी विचारों को आने से रोकने में है।


मन में आये विचार, बोले गये वचन और काया से किये गये कर्म से संस्कारों का निर्माण होता है। बोले गये वचन और किये गये कर्म का आधार विचार ही होता है। विचार को ही रोक लिया जाये तो यह वचन अथवा कर्म में परिवर्तित नहीं हो पायेंगे।


विचारों के कारण उत्पन्न कर्म न्यून बल के होते हैं, वचन के कारण उत्पन्न संस्कार मध्यम बल के तथा कर्म के कारण उत्पन्न संस्कार अधिक बल के होते हैं। 


न्यून बल के संस्कार को समाप्त करना सरल होता है, मध्यम बल के संस्कार को समाप्त करना थोड़ा कठिन और किये गये कर्म के कारण उत्पन्न अधिक बल के संस्कार को समाप्त करना सबसे कठिन होता है। 


अच्छा हो कि इन संस्कारों को निर्मित ही न होने दें।


प्रियतम अवतार मेहेरबाबा कहते हैं कि निरन्तर मेरा नाम सुमिरन करें जो कि विचारों को दूर रखने में उसी प्रकार सहायक होगा जैसे मच्छर को दूर रखने के लिये मच्छरदानी सहायक होती है।


 *सादर*

*प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेन्द्र सदा*

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सादर प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेन्द्र सदा,

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सादर जय प्रियतम अवतार मेहर बाबा जय जिनेंद्र सदा

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