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बहुत पुरानी बात है, एक नगर में दो व्यक्ति एक दूसरे के पड़ोस में रहते थे। एक व्यक्ति सम्पन्न था और दूसरा बहुत गरीब।
एक दिन नारद जी ने दोनों को देखा और वे विष्णु भगवान के पास गये। उन्होंने आश्चर्य प्रकट करते हुये विष्णु भगवान से यह समझाने का आग्रह कि दोनों पड़ोसी हैं किंतु एक इतना अमीर और दूसरा इतना गरीब। ऐसा क्यों है।
नारदजी ने भगवान से पूछा, भगवान यह कैसा न्याय है, एक व्यक्ति इतना संपन्न और दूसरा इतना गाना।
विष्णु भगवान ने कहा - नारद जी, इस स्थिति के लिये वे दोनों खुद ज़िम्मेदार हैं। नारद जी ने कहा - भगवान, हम कुछ समझे नहीं, कृपया इसे विस्तारपूर्वक समझाईये।
विष्णु भगवान ने नारदजी से कहा - आईये, दोनों के पास चल कर ही, हम आपके प्रश्न का उत्तर ढूँढते हैं।
नारद जी और विष्णु भगवान भेष बदल कर, पहले ग़रीब व्यक्ति के घर पहुँचे।
गरीब व्यक्ति अपनी टूटी-फूटी झोपड़ी में पुरानी खटिया पर बैठा होता है। भगवान विष्णु, व्यक्ति से पूछते हैं कि क्या तुम भगवान से कुछ चाहते हो। वह व्यक्ति कहता है कि मैं हमेशा अपने पड़ोसी की तरह संपन्न बनना चाहता हूँ। क्या आप मेरी मदद कर सकते हैं? भेष बदले विष्णु भगवान कहते हैं - बिल्कुल मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ, मेरे पास एक मंत्र है, अगर तुम उस मंत्र को अपना लो तो तुम भी अपने पड़ोसी की तरह संपन्न हो सकते हो।
भगवान की यह बात सुनकर वह व्यक्ति उत्तर देता है - जी हाँ, आप मुझे मंत्र बतायें, मैं मंत्र अपनाने को तैयार हूँ।
विष्णु भगवान कहते हैं ठीक है, तो सुनो, तुम्हें ईश्वर को धन्यवाद देना होगा।
यह सुनकर, व्यक्ति कहता है मैं ईश्वर को किस बात का धन्यवाद दूँ। ईश्वर ने मुझे कुछ नहीं दिया। विष्णु भगवान एक बार फिर उस व्यक्ति से पूछते हैं तो वह व्यक्ति फिर ईश्वर को धन्यवाद देने को मना करता है।
जैसे ही वह व्यक्ति ईश्वर को धन्यवाद देने को मना करता है, भगवान उससे कहते हैं कि यदि तुम मंत्र को नहीं मानोगे तो तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता है। यह कहते हुये भगवान और नारद जी अंतर्ध्यान हो जाते हैं। तभी इस व्यक्ति की एक मात्र खटिया भी टूट जाती है और ज़मीन में गढ्ढा हो जाता है जहाँ वह गिर जाता है।
विष्णु भगवान और नारद जी अब सम्पन्न व्यक्ति के घर पहुँचते हैं और दरवाज़ा खटखटाते हैं।अमीर आदमी मुस्कुराते हुये दरवाज़ा खोल कर वेष बदले हुये भगवान विष्णु और नारद जी का स्वागत करता है और निश्छल हृदय से बड़ी आवभगत करता है।
भगवान उस व्यक्ति से कहते हैं कि हम दोनों तुम्हारे अतिथि सत्कार से बहुत प्रसन्न हुये हैं। बताओ हम तुम्हारे लिये क्या कर सकते हैं ?
यह सुनते ही वह व्यक्ति कहता है कि भगवान का दिया मेरे पास सब कुछ है किंतु .....। भगवान उससे पूछते हैं किंतु क्या, तुम निःसंकोच हम से कहो।
व्यक्ति ने कहा - भगवान ने हमको इतना अधिक धन दिया है कि इसे समेटते नहीं बनता। मैं चाहता हूँ कि भगवान मुझे और धन नहीं दें मुझे अब और धन नहीं चाहिये।
यह सुनकर भगवान ने इस व्यक्ति से कहा- यदि तुम ऐसा चाहते हो तो मैं तुमको एक मंत्र बता सकता हूँ, तुम्हें इस मंत्र को अपनाना होगा। अगर तुमने यह मंत्र अपना लिया तो जो तुम चाहोगे, वैसा ही होगा।
वह व्यक्ति भगवान से कहता है कि वे उसे मंत्र ज़रूर बतायें। भगवान इस व्यक्ति से कहते हैं कि तुमको बात-बात में ईश्वर को धन्यवाद देना छोड़ना होगा।
यह सुनकर वह व्यक्ति कहता है मेरे पास जो कुछ भी है वह सब ईश्वर का दिया हुआ है, मैं किस प्रकार ईश्वर को धन्यवाद देना छोड़ दूँ।आपका मंत्र तो मैं नहीं मान सकता हूँ।
यह सुनकर भगवान ने उस व्यक्ति से कहा कि अगर तुम मंत्र नहीं मानोगे तो तुम्हारी संपन्नता इसी तरह बढ़ती ही जायेगी, यह कभी नहीं रुकेगी तुम्हारा भी कुछ नहीं हो सकता।
नारद जीअब देख रहे थे।उन्हें अपने प्रश्न उत्तर मिल गया । विष्णु भगवान और नारद जी एक दूसरे को देख कर मुस्कुराये और अपने धाम लौट गये।
*सादर*
*प्रियतम अवतार मेहेरबाबा की जय जय जिनेंद्र सदा*
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Chandar Meher