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Saturday, May 30, 2026

गृध्रराज पर्वत का महात्म्य 🌈🌈

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कल 14 दिसंबर को गिधैला, देवराजनगर, मैहर में, गृध्रराज पर्वत के सम्मुख, एक पहाड़ पर निर्माणाधीन राजाधिराज बड़े मंदिर के परिसर जिसे छोटी अयोध्या भी कहा जाता है, जहाँ पंचमुखी बजरंगबली भगवान विराजे हैं, में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा खाद्य प्रसंस्करण से रोज़गार विषय पर इस रमणीक स्थल पर आयोजित प्रशिक्षण में भाग लेने का मौका मिला।

यह पर्वत, विंध्याचल की कैमूर श्रृंखला (Kaimur Range) और मैकाल पहाड़ियों (Maikal Hills) के बीच में पड़ता है।

​यह पर्वत स्वयं उत्तर में कैमूर श्रृंखला की पहाड़ियों और दक्षिण में मैकाल पहाड़ियों के बीच स्थित है, लेकिन इसे समग्र रूप से विंध्याचल पर्वतमाला का पूर्वी विस्तार माना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस पर्वत का आकार जटायु महाराज की आकृति की तरह है।

यह भी कहा जाता है कि इस पर्वत की तलहटी में जटायु जी के अनुज संपाति का जन्म हुआ था तथा जटायु महाराज और संपाति जी यहीं रहा करते थे।

पुराणों में उल्लेख है कि संपाती और जटायु विंध्याचल पर्वत की तलहटी में रहने वाले निशाकर ऋषि की सेवा करते थे और दंडकारण्य क्षेत्र में विचरण करते थे।

ऐसा कहा जाता है कि रावण से युद्ध में आहत हो कर जटायु महाराज इसी पर्वत पर आये थे।

ऐसा माना जाता है कि इस पर्वत पर भगवान राम ने एक रात विश्राम किया है तथा भरत जी का आश्रम भी यहीं स्थित था।
इस पर्वत पर कई ऋषि मुनियों ने तपस्या की है और अभी भी करते हैं।

इस पर्वत के दूसरी ओर सिद्ध बाबा का आश्रम है जिसके पास से एक ठंडी जल धारा का उद्गम है जो आगे जा कर गर्म हो जाती है। कुछ दूर और जाने पर यह विलुप्त हो जाती हैं। इन्हें मानसी गंगा कहा जाता है।
इन्हें पवित्र मानकर और महाकवि कालिदास की एक रचना (गृद्धराज महात्म्य) के आधार पर 'मानसी गंगा' नाम दिया गया है। यह मान्यता है कि इस जलस्रोत में स्नान करने से शुद्धि प्राप्त होती है।

इस पर्वत से कुछ दूर पर स्थित एक और पहाड़ पर माँ काली का मंदिर है जो कि मैहर में विराजी माँ शारदा की बहन मानी जाती हैं।

माता जी की मूर्ति, ज़मीन की खुदाई में मिली हैं जिसकी जानकारी स्थानीय शासक को स्वप्न में मिली।
*सादर*
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Yours Sincerely
Chandar Meher

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