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बात आज से लगभग 5000 साल पहले की है। पांडवों और कौरवों के बीच कुरुक्षेत्र में महाभारत का भीषण युद्ध चल रहा था। रोज हजारों हज़ार योद्धा वीरगति को प्राप्त हो रहे थे। किन्तु युद्ध का निर्णय नहीं हो पा रहा था जिसका एक बड़ा का कर्ण थे, और युधिष्ठिर इस परिस्थिति को भाँप रहे थे। ऐसी विकट परिस्थिति में बेहद संयमी युधिष्ठिर का संयम भी डिग गया।
उन्होंने असंयमित होकर अर्जुन से कहा -अर्जुन तुम कैसे धनुर्धर हो और कैसा तुम्हारा गांडीव है जो कर्ण को नहीं जीत पा रहा है।
अर्जुन अपने धनुष के तिरस्कार और अपमान को सुनकर धर्मसंकट में पड़ गये। अर्जुन ने यह संकल्प लिया था तो गांडीव का अपमान करने वाले व्यक्ति को वे जीवित नहीं छोड़ेंगे, पर वे अपने बड़े भाई को तो नहीं मार सकते हैं तो फिर क्या उनका संकल्प टूटेगा ?
अर्जुन के मन के इस ऊहापोह को पढ़ कर भगवान कृष्ण कहते हैं - अर्जुन तुम्हारी समस्या का समाधान शास्त्रों में है, यदि तुम अपने भाई का अपमान कर दो तो वह उनकी हत्या के बराबर ही है।
न चाहते, हुये भी अर्जुन राज दरबार में जा कर युधिष्ठिर से कहते हैं कि यह निरर्थक युद्ध सिर्फ इस कारण लड़ा जा रहा है क्योंकि आपने जुआ खेला और आप सब कुछ हार गये। छोटे भाई के हाथों इस प्रकार का अपमान देखकर युधिष्ठिर अवाक रह जाते हैं।
इस घटना के बाद अर्जुन बेहद दुखी हो जाते हैं कि उन्होंने अपने बड़े भाई का अपमान किया। वे अब आत्महत्या करना चाहते थे। भगवान कृष्ण ने उन्हें फिर समझाया कि इस समस्या का समाधान भी शास्त्रों में है। अर्जुन ने भगवान से पूछा कि मेरी इस भावना से छुटकारा का क्या उपाय है ?
भगवान ने अर्जुन से कहा कि तुम स्वयं की प्रशंसा करो। शास्त्र कहते हैं कि स्वयं की प्रशंसा आत्महत्या के बराबर ही है।
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Chandar Meher