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Friday, August 3, 2018

आऊटपुट और आऊटकम

एक बंदर शहर से जंगल लौट के आयाऔर सभी जानवरों को बताया कि शहर में चुनाव के माध्यम से राजा चुना जाता है इसी प्रकार जंगल के राजा का भी चुनाव किया जाना चाहिये। बंदर ने चुनाव के लिए सभी जानवरों को राजी भी कर लिया।
जंगल में भी चुनाव हुये, बंदर भी चुनाव में खड़ा हुआ और जीत गया। जीतकर वह जंगल का राजा बन बैठा।
एक दिन एक बकरी अपनी फरियाद लेकर बंदर के पास आई, उसने कहा कि चीता उसके मेमने को खाना चाहता है। उसने बंदर से आग्रह किया कि वह उसके मेमने को बचा ले।
जैसे ही बंदर ने यह सुना वह पेड़ों में इधर-उधर कूदने लगा। बकरी आश्चर्य से बंदर को देखती रही फिर उसने दोबारा बंदर से गुहार लगाई महाराज वह चीता मेमने को खा जाएगा उसे बचा लीजिये।
यह सुनते ही बंदर ने बकरी से कहा कि देखो बकरी मेरे प्रयासों में कोई कमी हो तो बताओ। तुम्हारा मेमना बचे यह ना बचे यह मैं नहीं बता सकता।
यह पुरानी कहानी है जो कल जब याद आई तब समझ में आया कि बंदर जो कर रहा था वह आउटपुट था पर बकरी जो चाहती थी वह आउटकम था, जो उसे मिला नहीं।
ऐसा आउटपुट किस काम का जिसका कोई ऑउटकम ना हो। 
स्वतंत्रता दिवस पर जय हिंद जय भारत
🌷🌷🙏🙏🌷🌷

Saturday, June 16, 2018

 न होता तो क्या होता -एक प्रसंगM

एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर मैं गदगद हो गया ! यदि मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो क्या होता ? 
बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मुझे भी लगता कि यदि मै न होता तो सीताजी को कौन बचाता ? परन्तु आज आपने उन्हें बचाया ही नहीं बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब मै समझ गया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं, किसी का कोई महत्व नहीं है !

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो मै बड़ी चिंता मे पड़ गया कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है तो मै क्या करुं ?
पर जब रावण के सैनिक तलवार लेकर मुझे मारने के लिये दौड़े तो मैंने अपने को बचाने की तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो मै समझ गया कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया !
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो मैं गदगद् हो गया कि उस लंका वाली संत त्रिजटा की ही बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...

        मै न होता तो क्या होता

Friday, June 15, 2018

*मैं ना होता तो क्या होता" पर एक प्रसंग

एक बार हनुमानजी ने प्रभु श्रीराम से कहा कि अशोक वाटिका में जिस समय रावण क्रोध में भरकर तलवार लेकर सीता माँ को मारने के लिए दौड़ा, तब मुझे लगा कि इसकी तलवार छीन कर इसका सिर काट लेना चाहिये, किन्तु अगले ही क्षण मैंने देखा कि मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया, यह देखकर मैं गदगद हो गया ! यदि मैं कूद पड़ता तो मुझे भ्रम हो जाता कि यदि मै न होता तो क्या होता ? 
बहुधा हमको ऐसा ही भ्रम हो जाता है, मुझे भी लगता कि यदि मै न होता तो सीताजी को कौन बचाता ? परन्तु आज आपने उन्हें बचाया ही नहीं बल्कि बचाने का काम रावण की पत्नी को ही सौंप दिया। तब मै समझ गया कि आप जिससे जो कार्य लेना चाहते हैं, वह उसी से लेते हैं, किसी का कोई महत्व नहीं है !

आगे चलकर जब त्रिजटा ने कहा कि लंका में बंदर आया हुआ है और वह लंका जलायेगा तो मै बड़ी चिंता मे पड़ गया कि प्रभु ने तो लंका जलाने के लिए कहा ही नही है और त्रिजटा कह रही है तो मै क्या करुं ?
पर जब रावण के सैनिक तलवार लेकर मुझे मारने के लिये दौड़े तो मैंने अपने को बचाने की तनिक भी चेष्टा नहीं की, और जब विभीषण ने आकर कहा कि दूत को मारना अनीति है, तो मै समझ गया कि मुझे बचाने के लिये प्रभु ने यह उपाय कर दिया !
आश्चर्य की पराकाष्ठा तो तब हुई, जब रावण ने कहा कि बंदर को मारा नही जायेगा पर पूंछ मे कपड़ा लपेट कर घी डालकर आग लगाई जाये तो मैं गदगद् हो गया कि उस लंका वाली संत त्रिजटा की ही बात सच थी, वरना लंका को जलाने के लिए मै कहां से घी, तेल, कपड़ा लाता और कहां आग ढूंढता, पर वह प्रबन्ध भी आपने रावण से करा दिया, जब आप रावण से भी अपना काम करा लेते हैं तो मुझसे करा लेने में आश्चर्य की क्या बात है !

इसलिये हमेशा याद रखें कि संसार में जो कुछ भी हो रहा है वह सब ईश्वरीय विधान है, हम और आप तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिये कभी भी ये भ्रम न पालें कि...

        *मै न होता तो क्या होता*

Saturday, July 8, 2017

तो समझें कि मोक्ष प्राप्त हुआ....

बड़े-बड़े ऋषि महर्षियों नें कर्म के सिद्धांत को अपने अपने ढंग से प्रतिपादित किया है. अभी कुछ दिन पूर्व एक ऐसी ही व्याख्या पढ़ने को मिली. इस निरूपण के अनुसार आम की बोई गई गुठली सदृश्य है गुणधर्म और सम्भावनाओं से परिपूर्ण एक इकाई की और इसे बोने का कार्य सदृश्य है किये गये कर्म के और जो पौधा तैयार होता है वह कर्म के कारण उत्पन्न संस्कार के जैसा है. जिस वातावरण में पौधा वृक्ष बनता है वह परिजनों का आश्रय और समाज द्वारा प्रदत्त दिशा होती है. जो फूल और फल लगते हैं वह सदृश्य होते है कर्म के स्वरूप प्राप्त परिणाम के. फल के सेवन के उपरांत मिली गुठली फिर बोई जाती है जो पुन: द्योतक है कर्म की. यह कर्म (गुठली का बोना) दो प्रकार से किया जा सकता है. प्रथम इंच्छा सहित जिससे संस्कार का निर्माण होता है द्वितीय इच्छारहित हो कर किया गया कर्म जो कि निष्काम कर्म है और ऐसा करने से संस्कार का निर्माण नहीं होता. तीसरी स्थिति वह है जहाँ  फल तो खाने की इच्छा है किंतु गुठली बोई ही न जाये यह है इच्छासहित कर्महीनता. यह स्थिति, परिणाम स्वरूप जीवन में न्यूनता प्रदान करती है.
गुठली रूपी इकाई से संस्कार रूपी पौधा पनपता है जो के गुठली के ही गुणधर्म को प्राप्त करता है यही गुणधर्म, परिणाम रूपी फूल और फल को प्राप्त होते हैं.  फिर परिणाम रूपी फल-फूल के उपयोग अथवा उपभोग के बाद पुन: गुठली रूपी अगली इकाई प्राप्त होती है जो कि आगामी संस्कार को फिर प्रभावित करती है.
समय पा कर उपलब्ध वातावरण और परिवर्तित होते वातावरण (परिवार और समाज) के कारण पौधा (संस्कार) प्रभावित होता है तथा उस पौधे में कभी-कभी परिवर्तन भी आता है जिसके कारण फूल-फल और उससे उपजी गुठली के गुणों में भी फर्क़ आता है. गुठली अनुकूल वातावरण पा कर परिवर्तित संस्कार को प्रकट करती है और विकास का क्रम प्रारम्भ होता है.   
यह चक्र चलता रहता है. इस चक्र में गुठली या बीज का बोना हमारे हाथ में है. हम किस फसल अथवा पौधे की गुठली अथवा बीज बोते हैं यह भी हमारे हाथ में हैं. यदि हम आम का बीज बोते हैं तो आम खाने मिलेगा और यदि बबूल बोते हैं तो काँटे ही मिलेंगे. 
इस चक्र से छुटकारे के लिये पहली बात तो आम बोयें बबूल नहीं. दूसरी बात आम की बोनी, परिणाम के प्रति इच्छा रहित हो कर करें अर्थात आम के फल का उपभोग नहीं उपयोग करें. उपभोग से तात्पर्य है कि स्वार्थवश समूचे फल का सेवन स्वयं करना तथा उपयोग का तात्पर्य है परमार्थ की भावना सहित फल का सेवन मिल बाँट कर किया जाए. यह पर्मार्थ प्रारम्भ में सीमित और फिर असीमित हो पूरी सृष्टि को विलोपित कर ले तो समझें कि मोक्ष प्राप्त हुआ 
प्रियतम अवतार मेहेर बाबा जी की जय

Saturday, August 27, 2016

बिन माँगे मोती मिले ....

एक सभा में घमासान मचा हुआ था कोई भी सदस्य किसी अन्य को सुनने के तैयार ही नहीं था. बस सब अपनी अपनी सुनाने में जुटे थे. सभा कोई भी दिशा नहीं पकड़ पा रही थी. सभा की यह दशा देख कर सभापति बहुत ही परेशान हो उठे.
फिर उन्हें एक उपाय सूझा, उन्होंंने सभी सदस्यो को एक खेल खेलने के लिये राज़ी कर लिया. 
खेल की शुरुआत में सभी सदस्यों को एक –एक गुब्बारा दिया गया, सभापति के कहे अनुसार समस्त सदस्यों ने अपने-अपने गुब्बारे को फुला कर अपना-अपना नाम लिख दिया फिर बाजू वाले बड़े से कमरे में छोड़ कर आ गये.
खेल के दूसरे कदम में इन सदस्यो को फिर से इस कमरे में भेजा गया जहाँ से इन्हें अपने नाम वाले गुब्बारे को 5 मिनट के भीतर ले कर वापस सभाकक्ष में आना था. किंतु सभी सदस्य इस कार्य में विफल हो गये.
खेल के तीसरे कदम में सदस्यों को नये गुब्बारे दिये गये जिन्हें फुला कर एक बार फिर से इन सदस्यों ने अपना-अपना नाम लिखा और बाजू वाले बड़े कमरे में रखा. खेले को आगे बढ़ाते हुये और सभापति के आदेश को मानते हुये, सभी सदस्य एक बार फिर से उस कमरे में गये जहाँ 5 मिनट के भीतर जो भी गुब्बारा उन्हें मिलता उसे उठा कर सही सदस्य को दे कर वापस सभा कक्ष में लौटना था. अगले 3 मिनटों में ही सभी सदस्य सभाकक्ष में लौट कर आ गये. सभी के हाथ में सही गुब्बारा था.
सभापति ने सदस्यों से पूछा कि इस खेल से उन्होंने क्या सीखा ? सभी सदस्य चुप थे. तब सभापति बोले, प्रथम बार, जब आप को अपना नाम लिखा गुब्बारा लाना था तब बड़े कक्ष में जा कर आपने छीना-झपटी की, अपना गुब्बारा माँगा और वह नहीं मिला तो छीनने का प्रयास किया, बहुत प्रयास किया, पसीना बहाया, कुछ लोगों के कपड़े भी फटे किंतु सही गुब्बारा हाथ न आया, कार्य में विफलता मिली.
वहीं दूसरी बार जब 5 मिनट में सही व्यक्ति को ढूँढ कर उसका गुब्बारा उसे सौंपना था तो 3 मिनट में ही आपने सही व्यक्ति को ढूँढ कर गुब्बारा दे दिया और इस कार्य को पूर्ण करने में सफलता हासिल की, दोनों पक्षों को खुशी मिली, संतोष मिला और वह इसलिये क्योंकि इस बार आप सब ने अपने साथी को कुछ दिया न कि माँगा.  
इस के बाद सभा अपने आप सही दिशा में चली और सभा ने अपना कार्य पूरा किया.
1.  अधिक माँग और कम आपूर्ति = सम्मान, स्वीकार्यता और प्रसन्नता.
2.  माँग कम और आपूर्ति अधिक = निरादर, अस्वीकार्यता एवं असम्मान.
3.  माँग के अनुसार आपूर्ति = प्रेम, आनन्द और संतोष. 
इसी लिये तो कहा गया है- बिन माँगे मोती मिले ....... :)     



Friday, June 19, 2015

मैनेजमैंट स्टोरी: घोड़ा और बकरा

 एक किसान का घोड़ा बीमार हो गया. वह उठ भी नहीं पा रहा था. किसान ने डॉक्टर बुलाया और घोड़े को दिखाया. डॉक्टर ने दवाई देते हुये कहा कि यह दवाई अगले तीन दिन तक घोड़े को खिलाईये देखते हैं इसे कितना फायदा होता है. अगर फायदा नहीं होता है तो फिर इसे मारना ही होगा नहीं तो इसका संक्रमण दूसरे जानवरों में फैल जायेगा.
पास ही खड़े किसान के बकरे को यह बात सुनकर बहुत बुरा लगा. उसने भावुक हो कर घोड़े को समझाया कि घोड़े को खड़ा होना ही होगा नहीं तो उसे मार दिया जायेगा किंतु घोड़ा टस से मस नहीं हुआ. दूसरे दिन बकरे ने घोड़े को और ज़ोर दे कर समझाने की कोशिश की किंतु बकरा फिर भी असफल रहा.  दूसरा दिन गुज़रा और फिर तीसरा दिन भी आ गया. डॉक्टर आया. डॉक्टर को आता देख बकरे ने घोड़े से कहा कि भाई देखो अब तुम्हारे पास करो या मरो कि स्थिति है. खड़े हो जाओ...... दौड़ लगाओ......  नहीं तो यह डॉक्टर तुम्हें मार डालेगा. उठो............. इतना सुनना था कि घोड़ा दम लगा कर उठ खड़ा हुआ ....... बकरा फिर चिल्लाया ..... भागो........ इतना सुनना था कि घोड़ा दौड़ने लगा.... फिर हवा से बातें करने लगा.......
यह देख कर किसान खुशी से चिल्ला उठा और दौड़ा-दौड़ा अपनी पत्नी के पास गया और बोला ..... वाह् ... अपना घोड़ा ठीक हो गया है ..... वह दौड़ रहा है ..... मज़ा आ गया ... चलो दावत करते हैं .... बकरा लाओ .... आज बकरा बनाओ....
शिक्षा: अक्सर मैनेजमैंट को पता नहीं होता है कि ओफिस में काम कौन कर रहा है. सबसे पहले काम करने वाले का ही काम तमाम होता है.     
मैनेजमैंट स्टोरी: घोड़ा और बकरा
कथा स्त्रोत: व्हॉटस्-अप 

Monday, September 8, 2014

यस बॉस

  1. जब आप नौकरी पर पहली बार जाते हैं तो प्राम्भिक दिनों में आपका अधिकारी आपकी क्षमताओं का आकलन करता है. अधिकारी का भरोसा जीतें यह आपकी प्राथमिकता की सूची में पहला कार्य होना चाहिये. कोई न कोई ऐसे कार्य में आपकी कुशलता होने चाहिये कि जब भी उस कार्य की बात आये तो अधिकारी सिर्फ आपको ही बुलाये.
  2. जब आप कोई नई नौकरी प्रारम्भ करते हैं या आपके ऑफिस में कोई नया अधिकारी नियुक्त होता है या स्थानंतरित हो कर आता है तब यह भी एक सन्धि काल होता है. इस समय भी बड़े धैर्य का परिचय देने का समय होता है. आपका अधिकारी इस अवधि में सूक्ष्मता से आपकी परीक्षा लेता है. इस समय आप अपने कार्य और क्षमता को अपने पक्ष में कार्य करने दें. बोलें कम और कार्य अधिक करें.  
  3. कार्यालय में कई अधीनस्थ कार्यरत होंगे किंतु अधिकारी इन अधीनस्थों से ही चुन कर अपनी एक कोर टीम बनाता है, जिसपर वह सबसे अधिक विश्वास करता है.सन्धि काल के समय की गई जाँच पड़ताल के नतीजे के आधार पर ही वह अपने यह टीम बनाता है. यह अपने अधिकारी और नये माहौल को समझ कर नये सिरे से भरोसा जीतने का समय होता है.
  4. यदि अधिकारी आप को कोई कार्य सौंपता है तो उसे धन्यवाद दें क्योंकि या तो वह आप पर भरोसा कर रहा है या फिर आपकी परीक्षा ले रहा है जिसमें सफल होने पर वह आपको अपनी कोर टीम में शामिल कर सकता है. कोर टीम में शामिल होने पर आप अपनी नौकरी को सुरक्षित मान सकते हैं. पर हो सकता है कि और सहयोगियों की आँखों की किरकिरी आप हो जायें और यह सहयोगी आप को चुनौती देते रहें जिस कारण अधिकारी के समक्ष आपको रह रह कर परीक्षा देते रहने पड़े. किंतु बिना इन सहयोगियों की चिंता किये आप अपनी ज़िम्मेदारी पूर्ण करते रहें. कार्य पूर्ण होने के उपरांत अधिकारी को सूचित अवश्य करें.  
  5. कुछ अधिकारी अपना भय दिखा कर शासन करना चाहते हैं ताकि उनका भय शासन करे तथा वे कार्य भार से मुक्त रहें. ऐसे अधिकारी को अक्सर चापलूस लोग घेर लेते हैं और अपने चश्मे से ही कार्यालय दिखाते हैं और साहब के भय का प्रचार प्रसार कर के अधिकारी की सहायता करते हैं तथा अधिकारी और बाकी अधीनस्थों के बीच अपने आप को एक चैनल के रूप में स्थापित करते हैं. ऐसे लोगों की चिंता न करें. आप अपना कार्य ज़िम्मेदारी और इमानदारी से करें. अंतत: अधिकारी चाहता है कि कार्य समय पर पूर्ण हो और जो अधीनस्थ ऐसा करते हैं अधिकारी उनकी कद्र करते हैं.
  6. जब भी अपको यह सूचना मिले के अधिकारी ने आपको बुलाया है आप हड़बड़ी में न जायें. एक गहरी साँस लें और विचारे करें कि अधिकारी ने आपको पिछला कौन सा कार्य  आप को सौंपा था जिसे आप निपटा रहें हैं और कार्य कि अभी तक क्या प्रगति हुई है.
  7. अधिकारी के पास जाने से पहले एक बार अपने कपड़े ध्यानपूर्वक सम्भाल लें, जैसे शर्ट इन कर लें, बालों पर कंघी फिरा लें. प्रेज़ैन्टेबल होने से स्वयं का आत्मविश्वास बढ़ता है. इसके उपरान्त ही अधिकारी से मिलें.    
  8. जब भी अधिकारी के पास जायें तो साथ में पेन और डायरी साथ ले जायें. पैन पहले से चला कर देख लें और डायरी के जिस पन्ने पर लिखना है उसे निकाल कर पहले से ही रख लें.अधिकारी द्वारा दिये गये आवश्यक निर्देशों को लिख लें और साथ ही अपने मन में उठ रहे प्रश्न भी लिख लें.अधिकारी की बात पूरी हो जाने दें तब मौका निकाल कर अपने सवाल विनम्रतापूर्वक पूछें और उनका उत्तर भी डायरी में लिख लें.   अधिकारी की बात बिलकुल भी न काटें और आपका प्रश्न कितना भी आवश्यक क्यों न हों बीच में बिलकुल न पूछें. अधिकारी की बात ध्यानपूर्वक सुनें और ग्रहण करें.कुछ अधिकारी आपको बिना पूर्व तैयारी के अचानक प्रश्न कर, स्तब्ध करना चाहते हैं. ऐसी परिस्थिति में भी यदि आपकी वर्क डायरी आप के साथ है तथा अपटूडेट है तो आपको कोई परेशानी नहीं होगी.   
  9. जब  आपका अधिकारी, आपसे प्रश्न करें तब समझें कि वह आपसे सुनने को तैयार है, इस परिस्थिति में ही आप बोलें अन्यथा आपकी बात का अनादर हो सकता है. अधिकारी को सलाह भूल के भी न दें.अधिकारी के पास कभी भी समस्या लेकर न जायें अन्यथा कुछ समय बार अधिकारी आपको ही समस्या के रूप में पहचानेगा. अधिकारी के पार हमेशा समाधान लेकर ही जायें और प्रिय बनें.
  10. कोई भी आवश्यक बात यदि आप अधिकारी से करना चाहें तो ऐसा समय चुनें जब अधिकारी के पास या उसके कक्ष में और कोई भी व्यक्ति न हो अन्यथा वह अन्यावश्यक हस्तक्षेप कर सकता है. 
  11. अधिकारी के दिनचर्या तथा उसकी आवशयाकताओं का पूरा पूरा ज्ञान रखें तथा अपनी दिनचर्या उसी अनुसार बनायें. आप अधिकारी से पहले कार्यालय पहुँचें और अधिकारी के कार्यालय छोड़ने के उपरान्त ही कार्यालय छोड़ें.
  12. कार्यालयीन कार्य तो अधिकारी हेतु आवश्यक होता ही है किंतु ध्यान रखें कि अधिकारी के व्यकिगत कार्य अधिक महत्वपूर्ण होता है. यदि आप आगे बढ़ कर इसमें सहयोग करते हैं तो यह आपको अधिकारी के नज़र में और भी अधिक बहुमूल्य बनायेगा.  

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